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मन के विचार

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हार कैसे मानलू मैं अपने पिता से जो सीखा है उम्मीद का फूल कैसे तोड़ दू मैं अपने हाथो से जो सीचा है हंसना कैसे भूलूं मैं  अपनी माता से जो सीखा है। ज़िंदगी है इसलिए तो सता रही है मौत तो आनी है लेकिन वो कहा कुछ बता रही है दिन में चांद देखने की तमन्ना होती है और चांद आते ही सूरज की कामना  फस चुका हु अपने ही विचारो में इनसे बाहर तो आना है लेकिन इनसे दूर भी नही जाना है। -आपसे फिर मिलूंगा मेरे अगले ब्लॉग में।

मैं खोया तो नही ?

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मैं अक्सर खुद से सवाल करता हु की मैं खोया तो नही चोट लगने के बाद दिल से पूछता हु तू कही रोया तो नही उमर चौबीस है लेकिन ज़िंदगी को बोहोत करीब से देख लिया है काफी आगे आ चुका हु गिरते चलते सायद और भी दूर जाना है  लेकिन रास्ते कुछ अजीब से है इन्ही रास्तों को देखकर खुद से सवाल करता हु की मैं खोया तो नही। है कुछ सपने अधूरे से पूरे करने की इच्छा और क्षमता भी है लेकिन कुछ जिम्मेदारियों से दबा हुआ हु इसे किस्मत का दोष कहूं या खुदा की परीक्षा एक तरफ मेरी पसंदीदा चीज है और दूसरी तरफ मेरे परिवार की खुशियां इन्ही के बीच रहकर खुद से सवाल करता हु की मैं खोया तो नही। -आपसे फिर मिलूंगा मेरे अगले ब्लॉग में।